स्लम के जिन बच्चों को गरीबी की वजह से स्कूल छोड़ना पड़ा, उन्हें मुफ्त पढ़ाने का उठाया बीड़ा

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ये हैं आयुष। इनका खुद का सपना आईएएस अधिकारी बनने का है, लेकिन उन बच्चों का भी भविष्य संवारना चाहते हैं, जो गरीबी या सामाजिक कारणों से पढ़ाई नहीं कर पा रहे हैं। उन्होंने शिक्षा से वंचित बच्चों की पढ़ाई का बीड़ा उठाया है। ऐसे बच्चों को स्कूल दोबारा पहुंचाया, जो फीस न जमा होने के कारण स्कूल से निकाल दिए गए थे। बुरी लत के शिकार हो गए और जुआ खेलने लगे। आयुष अब तक 50 से अधिक ऐसे बच्चों का स्कूल में दाखिला करवा चुके हैं।
9 साल पहले जेब खर्च से शुरू किया सफर

बात 2009 की है, जब आयुष 12वीं के छात्र थे। घर आने वाली दाई ने बताया कि फीस जमा न होने के कारण उसके बच्चे को स्कूल से निकाल दिया गया। इसके बाद उनके मन में गरीब बच्चों की मदद की इच्छा उठी। उन्होंने अपने दोस्तों से बात की। सात दोस्त तैयार हो गए। तय हुआ, पॉकेटमनी से हर महीने 100-100 रुपए जमा किए जाएंगे। उस पैसे से दीपक, वरुण, वैभव, आकाश और विकास नामक लड़कों के स्कूल का खर्च उठाने और पढ़ाने की शुरुआत हुई। कभी पैसे की कमी से स्कूल से निकाल दिए गए वरुण व वैभव आज आईआईटी की तैयारी कर रहे हैं। इनके अलावा 50 से अधिक जरूरतमंद बच्चों को स्कूलों में दाखिला कराकर सारा खर्च आयुष व उनके दोस्त उठा रहे हैं।

सहयोग के तौर पर रद्दी पेपर लेते

जो लोग पैसे नहीं देते, उनके घर से रद्दी अखबार भी ले लेते थे। फिर उन्हीं पैसों से स्कूल से दूर बच्चों को स्कूलों में दाखिला कराना और उनकी फीस भरने से लेकर पढ़ाई-लिखाई से जुड़े तमाम खर्च को उठाने लगे। आयुष ने अलफाबेट्स नामक संस्था बना ली। आज 50 से अधिक बच्चों के स्कूल की फीस चुकाते हैं।

पर्सनालिटी डेवलपमेंट की क्लास भी

बकौल आयुष, जैसे ही पता चलता है कि कोई बच्चा पैसे के अभाव में नहीं पढ़ रहा है, पहले उसे उसके आसपास के प्राइवेट स्कूलों में दाखिला कराया जाता है। उसके बाद उस बच्चे की पूरी मॉनिटरिंग की जाती है। पढ़ाई के साथ साफ-सफाई और पर्सनालिटी डेवलपमेंट पर विशेष जोर दिया जाता है। बच्चों का चयन स्लम बस्ती में जाकर उनकी आर्थिक स्थिति देखकर किया जाता है। जिस बस्ती में ज्यादा बच्चे होंगे, वहां किसी सार्वजनिक जगह पर बच्चों की नियमित क्लास चलेगी।
Sources:-Dainik bhasakar

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