रामविलास पासवान का दावा : मैं गुडलक चार्म हूं, जिसके साथ होते हैं बाजी उसी की

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लोक जनशक्ति पार्टी (लोजपा) अध्यक्ष और केंद्रीय खाद्य मंत्री रामविलास पासवान को विपक्षी नेता मौसम वैज्ञानिक कहते हैं, जो माहौल को पहचान कर निर्णय लेते हैं। खुद पासवान का दावा है कि वह गुडलक चार्म हैं, जिसके साथ होते हैं बाजी उनकी होती है। पिछले कुछ दिनों की राजनीतिक उलझनों, सवालों और अटकलों के बाद उनकी पार्टी ने फैसला लिया है कि वह राजग में ही बरकरार रहेंगे। एक तेजतर्रार राजनीतिज्ञ की तरह पूरी प्रक्रिया के दौरान वह चाभी अपने सांसद पुत्र और लोजपा संसदीय बोर्ड के अध्यक्ष चिराग पासवान को सौंपकर खुद दूर खड़े रहे। जो फैसला हुआ उसमें लोजपा विजयी बनकर निकली।

बिहार में राजग घटक दलों के बीच सीटों के बंटवारे से आप संतुष्ट हैं?

पूरी तरह। मैं जनता के बीच का आदमी हूं। अपने लोगों के बीच रहना चाहता हूं और दूसरी ओर मंत्री होने की कई बड़ी जिम्मेदारियां निभानी होती हैं। इसीलिए सरकार के कामकाज और हाजीपुर के बीच समन्वय नहीं बन पा रहा था। पार्टी का भी मानना था कि मुङो अब राज्यसभा में आना चाहिए। पार्टी की मांग थी सिक्स प्लस वन। राजग ने उसे मान लिया।

हाजीपुर पारंपरिक रूप से आपकी सीट रही है। अब छोड़ रहे हैं तो वहां किसे उत्तराधिकारी बनाएंगे?

यह फैसला तो पार्टी करेगी। लेकिन अब जब 41-42 साल बाद ऐसा मौका आ रहा है कि मैं हाजीपुर से उम्मीदवार नहीं रहूंगा तो वहां की जनता को धन्यवाद देना चाहता हूं। अगर इस बीच कोई गलती हुई हो तो उसके लिए माफी भी मांगेंगे। मैं हाजीपुर जाऊंगा। सांसद कोटे से कुछ काम हुआ था, लेकिन कुछ बचा हुआ है उसे भी पूरा करना चाहूंगा। मैं तो यही कहना चाहूंगा कि मैं कहीं भी रहूं, हाजीपुर से मेरा स्नेह खत्म नहीं होगा। जनता ने मेरे ऊपर जितना विश्वास जताया है उसके कारण संबंध अटूट है। आशा करता हूं कि पार्टी जिसे भी वहां से उम्मीदवार बनाएगी जनता उस पर भी भरोसा करेगी और वह उम्मीदवार उनकी अपेक्षाओं पर खरा उतरेगा, इसकी गारंटी मैं दूंगा।

सीटों का अंतिम बंटवारा कब तक होगा?

जल्द होगा। लेकिन लोजपा की बहुत बड़ी भूमिका नहीं होगी। हमारी सीटों में तो केवल एक मुंगेर ही है जिस पर घटक दलों को फैसला करना है। शायद वह जदयू लड़ना चाहे। बाकी की हमारी सीटें तो पुरानी ही रहेंगी।

महागठबंधन के कई दल तो यह आशा लगाए बैठे थे कि आप उनके साथ जाएंगे। क्या आपसे कोई संपर्क साधा गया था?

प्रत्यक्ष या परोक्ष तौर भी कभी कोई संपर्क नहीं था। कुछ महीने पहले रघुवंश प्रसाद जी का एक बयान आया था और लोजपा पर तंज कसा गया था। मैंने उसी वक्त लताड़ दिया था। आज मुङो सम्मानजनक सीटें मिल गई हैं, लेकिन मैं तो पहले से कहता रहा हूं कि हम राजग में हैं।


पार्टी का एक विचार था कि लोजपा का बिहार से बाहर भी विस्तार होना चाहिए। यह फैसला भी हुआ था कि लोजपा को एक सीट उत्तर प्रदेश में मिलेगी?

हां, यह तब हुआ जब हम लोगों की बैठक केंद्रीय वित्त मंत्री अरुण जेटली जी के साथ हुई। उस स्थिति में हमें बिहार में पांच सीटें मिलतीं। लेकिन बिहार को लेकर पहले भी जदयू और भाजपा के बीच एक करार था- बराबर बराबर सीटों पर लड़ने का। उसे ध्यान में रखते हुए ही हमें छह सीटें अब बिहार में ही दे दी गई हैं। वैसे भी बिहार में ही हमारी पार्टी की जड़ें हैं।

एक अटकल यह भी है कि आपके परिवार में ही कुछ लोगों का विरोध था कि बिहार की सीटें छोड़कर दूसरे प्रदेश में दांव नहीं लगाना चाहिए?

ऐसी कोई बात नहीं है। हमारी पार्टी से पारस और चिराग एक साथ मिलकर सभी फैसले ले रहे थे। खुद मैं बाद में सीन में आया। कहीं कोई मतभेद नहीं था।

लोजपा संसदीय बोर्ड के अध्यक्ष चिराग पासवान की ओर से सरकार से कुछ सवाल पूछे गए थे। क्या अब लोजपा संतुष्ट है?

जिस चिट्ठी की बात आप कर रहे हैं, वह पुरानी है। यह तो तब हुआ था जब नोटबंदी को लेकर विपक्ष सवाल उठा रहा था। चिराग के संसदीय क्षेत्र में भी लोग नोट बदलने के लिए लाइन लगा रहे थे तो उसने कुछ जानकारी मांगी थी। वह दौर खत्म हो चुका है। कोई संशय की स्थिति नहीं है।

Dainik Jagran

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