शुरू हुआ चार दिन का अनुष्ठान, जानें पूजन विधि और महत्व

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सूर्य की उपासना का पर्व छठ हिन्दू नववर्ष के पहले माह चैत्र के शुक्ल पक्ष की षष्ठी को मनाया जाता है। इस पर्व में व्रती सूर्य भगवान की पूजा कर उनसे आरोग्यता, संतान और मनोकामनाओं की पूर्ति का आर्शीवाद मांगते हैं। आज नहाय-खा के साथ इस महापर्व की शुरुआत हो गई है। भगवान भास्कर को सायंकालीन अर्घ्य 11 अप्रैल और 12 अप्रैल को उदीयमान सूर्य को अर्घ्य के साथ अनुष्ठान संपन्न होगा।

आज नहाय-खाए में व्रती लौकी की सब्जी और अरवा चावल का प्रसाद ग्रहण करेंगे। छठ में इसका खास महत्व है। वैदिक मान्यता है कि इससे पुत्र की प्राप्ति होती है तो वैज्ञानिक मान्यता है कि गर्भाशय मजबूत होता है।

बुधवार को खरना में कद्दू की सब्जी और चने दाल खाने की परंपरा है। वैज्ञानिक दृष्टि से देखें तो कद्दे में लगभग 96 फीसदी पानी होता है। इसे ग्रहण करने से कई तरह की बीमारियां खत्म होती हैं। वहीं चने की दाल बाकी दालों में सबसे अधिक शुद्ध है। खरने के प्रसाद में ईख का कच्चा रस, गुड़ के सेवन से त्वचा रोग, आंख की पीड़ा, शरीर के दाग-धब्बे समाप्त हो जाते हैं। षष्ठी को पूरी तरह निराहार व निर्जला रहा जाता है। दरअसल वसंत और शरद ऋतु संक्रमण का काल माना जाता है। इसमें बीमारी का प्रकोप ज्यादा होता है। इसलिए बीमारी के प्रकोप से बचाव के लिए आराधना व उपासना पर जोर दिया गया है।

महत्व और पूजन विधि
चैती छठ पूजा में पवित्रता का खास ध्यान रखा जाता है। पूजा के चारों दिन उपवास के साथ कठिन नियम औ संयम का पालन किया जाता है। छठ पूजा महिलाओं के साथ ही पुरुष भी करते हैं। इस पूजा में कोरे और बिना सिले वस्त्र पहनने की परंपरा है। साथ ही व्रत के चार दिन तक व्रत सांसारिक सुख-साधनों से दूर रहते हैं और सात्विक भोजन ग्रहण करते हैं। डाला पर चढ़ता है फल मेवों का प्रसाद


चैती छठ कार्तिक छठ की तरह ही होता है, मगर यह छोटे पैमाने पर मनाया जाता है। इसमें डाला पर ठेकुआ के प्रसाद के स्थाप पर फल और मेवों का प्रसाद चढ़ाया जाता है। यह मूल रूप से पूर्वी भारत में मनाया जाता है, मगर दिल्ली, मुंबई जैसे भारत के अन्य शहरों में भी इसकी खासी रोनक देखने को मिलती है।

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