बेटियां पढ़ने में पीछे न रह जाए इसलिए मास्टर ने अकेले बना दिया नदी पर पुल

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औरंगाबाद जिला के कोराईपुर, ओबरा के निवासी शिक्षक मो रियाजुद्दीन पूरी जिंदगी संघर्ष करते रहे। आज भी कर रहे हैं। लेकिन जीवटता देखने लायक है। हार न मानने की जिद कोई मास्टर साहब से सीखे। इनकी अकेले चल देने की आदत, बेराह को राह बना देने का जुझारूपन बेमिसाल है। जी हां, ओबरा के कोराईपुर गांव के मोहम्मद रियाजुद्दीन को पूरा गांव मास्टर साहब के नाम से ही जानता है और इन्होंने गांव की बेटियों के लिए जो राह बनाई है, वह हर किसी के लिए प्रेरणास्नेत है। गांव की बेटियां पढ़ने में पीछे न रह जाए, इसलिए इन्होंने नदी पर रास्ता बना दिया।

मो. रियाजुद्दीन कहते हैं कि मेरे गांव कोराईपुर में सिर्फ मिडिल स्कूल है। हाई स्कूल के लिए बेटियों को ओबरा जाना पड़ता है। बीच में पुनपुन नदी है, जिसके कारण दो किलोमीटर से ज्यादा घूम कर ओबरा जाना पड़ता था। गांव के लोगों को भी परेशानी होती थी। मेरे मन में कई बार यह बात आयी। गांव के कुछ दोस्तों से बोला भी। लेकिन सब सुनकर चुप हो गए। एक दिन मैंने योजना बनाई कि यहां चचरी पुल बनाऊंगा। ज्योंही छठ में स्कूल की छुट्टी हुई, मैं लग गया। दोस्त शत्रुंजय मदद करने के लिए आगे आया। शत्रुंजय ने कहा कि यह नेक काम है और इसके लिए मैं अपनी बांस की कोठी से बांस दूंगा। फिर तो मैं आरी लेकर अकेले बांस काटने लगा। करीब 80-85 बांस मैंने काटा। उन्हें बारी-बारी से खींचते हुए नदी किनारे ले गया और टुकड़े-टुकड़े में काट कर चचरी लायक बनाया।

वे कहते हैं कि जब मैं बांस काट रहा था तब भी गांव के लोग कह रहे थे कि अच्छा काम कर रहे हैं, लगे रहिए, लेकिन कोई मदद करने नहीं आया। जब नदी में अकेले उतर गया, बांस गाड़ने के लिए तब भी कोई साथ नहीं दिया। लेकिन मैं अकेले काम करता रहा। इसके लिए मैंने खुद से शीशम की लकड़ी का दस किलो का हथौड़ा बनाया था। उससे बांस गाड़ता रहा। तब भी लोग देखते रहे और कहते रहे कि बढ़िया काम कर रहे हैं। हौसला बनाए रखिए, लेकिन नदी में कोई नहीं उतरा। बस कुछ दो-चार छोटे बच्चे जो नदी किनारे खेलते थे, वही लोग बांस पकड़ाते रहे। आखिरकार पांच दिनों में मेरी चचरी बन कर तैयार हो गई। गांव की बेटियां इसी रास्ते स्कूल जाने लगीं। अब तो हर दिन इस चचरी के रास्ते दो-चार हजार लोग नदी पार करते हैं।

मो. रियाजुद्दीन के पिताजी वैद्य हैं। सात भाई-बहनों में रियाजु सबसे बड़े हैं। ये कहते हैं कि संघर्ष तो बचपन से संघतिया बना हुआ है। मैट्रिक पास करने के बाद आगे पढ़ने के लिए पैसा ही नहीं था। तब मैंने ट्यूशन पढ़ाया, प्राइवेट स्कूल का टीचर बना, जगह-जगह जाकर पेंटर का काम किया, किताब पढ़कर स्टेब्लाइजर मिी का भी काम किया, अपने भाइयों को भी पढ़ाता रहा। गांव के बच्चों को भी पकड़-पकड़ कर स्कूल पहुंचाता रहा, अपनी तरफ से उन्हें कॉपी-पेन देता रहा, उनके माता-पिता को पढ़ाने के लिए समझाता रहा। कल के वे बच्चे आज के अच्छे छात्र बन गए हैं। उन्हें देखकर मुङो खुशी होती है। मन और दृढ़ता के साथ कहता है कि पढ़ाई का कोई विकल्प नहीं है। मेहनत का फल जरूर मिलता है। साथ-साथ समाज की बेहतरी के लिए हमें खुद आगे आना होगा। आखिर में कविता दोहराऊंगा कि अंधेरे से क्यूं घबराएं, अच्छा हो एक दीप जलाएं..।

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