किशनगंज-कटिहार की चाय पीयेंगे तो कहेंगे वाह बिहार!

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असम और दार्जिलिंग की चाय के बारे में तो सब जानते हैं लेकिन किशनगंज और कटिहार ब्रांड बिहार चाय है. बिहार में चाय की खेती सर्वप्रथम 1982 में किशनगंज जिले में आधा हेक्टेयर भूमि में शुरू की गयी थी अभी तेज विकास और विस्तार के चलते 50 एकड़ जमीन पर चाय की खेती हो रही है. अभी किशनगंज-कटिहार में लगभग 10 चाय रिफाइनिंग मशीन कार्यरत हैं.




यहां से भारत की कुल चाय का 2 फीसदी उत्पादन होता है. हालांकि एक दिलचस्प कहानी यह है कि वर्ष 1956 में राज्य पुनर्गठन आयोग द्वारा किशनगंज अनुमंडल के करणदिघी से सोनापुर (अब बंगाल) के छह प्रखंड काटकर यदि पश्चिम बंगाल को न दे दिये जाते तो किशनगंज के माध्यम से बिहार 1956-57 में चाय उत्पादक राज्य हो जाता.

कभी किशनगंज का हिस्सा रहा सोनापुर आज पश्चिम बंगाल में चाय व अनानास उत्पादन में कमाऊ पूत बना है. बिहार के चेरापूंजी के रूप में विख्यात किशनगंज-कटिहार में चाय की खेती के लिए मिट्टी व मौसम माकूल है. अधिक बारिश चाय की खेती के लिए मुफीद मानी जाती है. ठाकुरगंज, पोठिया व किशनगंज प्रखंड में लगभग 40 हजार एकड़ में चाय की खेती हो रही है. यहां की चाय दार्जलिंग जिले की चाय से बखूबी ठक्कर ले रही है. निजी टी प्रोसेसिंग प्लांट में बनी चाय बिहार के अन्य जिले सहित दूसरे प्रदेशों में भी खूब बिक रही है.




चाय के इतिहास के साथ बड़ी ही दिलचस्प कहानी जुड़ी हुई है. बात चार हजार साल पुरानी है. चीन का एक बादशाह हुआ करता था, जिसका नाम शिन नोंग था. एक बार वह शिकार पर गया और थककर पेड़ के नीचे आराम कर रहा था. पास ही उसके लिए पानी उबल रहा था. तभी पास ही के पड़े की कुछ पत्तियां उसमें आ गिरीं.

पानी उबला, बादशाह ने पीया और उसकी सारी थकान दूर हो गई और वह अपने साथ जाते हुए उस पेड़ की कुछ पत्तियां ले गया. इस तरह एक ऐसे पेय पदार्थ ने हमारे जीवन में कदम रखा, जिसने हमें कुछ पल सुकून से बिताने और बतियाने के अलावा सेहतमंद होने की दिशा में बढ़ाने के भी दिए.




खास यह कि आखिर वह क्या तत्व था जिसने बादशाह नोंग की सुस्ती दूर भगा दी. चाय में थियानिन होता है. जिससे दिमाग में अलर्टनेस आती है और सुकून मिलता है. इससे ताजगी का एहसास होता है.

Source : Ek Bihari Sab par Bhari

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