ये लोक गीत बताते हैं महापर्व का महत्व

0
288

राजधानी पटना सहित पूरे बिहार में चैती छठ महापर्व का चार दिवसीय अनुष्ठान मंगलवार से शुरू हो गया है। व्रती नहाय-खाए से अनुष्ठान का संकल्प लेंगे। भगवान भास्कर को सायंकालीन अर्घ्य 11 अप्रैल और 12 अप्रैल को उदयीमान सूर्य को अर्घ्य के साथ अनुष्ठान संपन्न होगा।

बिहार में चैत्र मास में भी छठ पूरी आस्था, निष्ठा व धूमधाम से मनायी जाती है। इन चार दिन छठ और छठी मैय्या के लोक गीतों को गाने-सुनने का काफी रिवाज है, जिससे घर और बाहर का माहौल काफी भक्तिमय हो जाता है।

लोकपर्व छठ के दौरान कर्इ कार्य जैसे प्रसाद बनाते, खरना के समय, अर्घ्य देने के लिए जाते हुए, अर्घ्य दान के समय और घाट से घर लौटते हुए अनेक मधुर और भक्तिपूर्ण लोकगीत गाये जाते हैं। हम यहां ऐसे ही कुछ गीत लेकर आये हैं।

पटना के घाट पर नारियर नारियर किनबे जरूर… नारियर किनबो जरूर…
हाजीपुर से केरवा मंगाई के अरघ देबे जरूर… अरघ देबे जरुर…
आदित मनायेब छठ परबिया वर मंगबे जरूर… वर मंगबे जरूर…
पटना के घाट पर नारियर नारियर किनबे जरूर…

इस गीत में छठ माता से धन, संतान और सुहाग से जुड़े वरदान मांगने की बात कही गर्इ है, जिसमें पूजा करने वाले कह रहे हैं कि वे पूरे विधि विधान से पूजा जरूर करेंगे और ऐसा करके छठ मां से इन चीजों का वरदान मांगेगे।

कांच ही बांस के बहंगिया, बहंगी लचकति जाए… बहंगी लचकति जाए…
बात जे पुछेले बटोहिया बेहंगी केकरा के जाए? बहंगी केकरा के जाए?
तू त आन्हर हउवे रे बटोहिया, बहंगी छठी माई के जाए… बहंगी छठी माई के जाए…
कांच ही बांस के बहंगिया, बहंगी लचकति जाए… बहंगी लचकति जाए…



‘केलवा जे फरेला घवद से, ओह पर सुगा मेड़राय, कांच ही बांस के बहंगिया, बहंगी लचकत जाए’, सेविले चरन तोहार हे छठी मइया। महिमा तोहर अपार। उगु न सुरुज देव भइलो अरग के बेर। निंदिया के मातल सुरुज अंखियो न खोले हे।

चार कोना के पोखरवा, हम करेली छठ बरतिया से उनखे लागी।
केरवा जे फरेला घवद से ओह पर सुगा मेड़राय। उ जे खबरी जनइबो अदिक (सूरज) से सुगा देले जुठियाए
उ जे मरबो रे सुगवा धनुक से सुगा गिरे मुरछाये, उ जे सुगनी जे रोये ले वियोग से आदित होइ ना सहाय देव होइ ना सहाय

इस गीत में एक ऐसे तोते का जिक्र है जो केले के एक गुच्छे के पास मंडरा रहा है आैर उसको डराया जाता है कि अगर तुम इस पर चोंच मारोगे तो तुम्हारी शिकायत भगवान सूर्य से कर दी जाएगी जो तुम्हें नहीं माफ करेंगे, फिर भी तोता केले को जूठा कर देता है और सूर्य के कोप का भागी बनता है। अब उसकी पत्नीसुगनी क्या करे बेचारी? कैसे सहे इस वियोग को? क्योंकि अब तो सूर्यदेव भी उसकी कोई सहायता नहीं कर सकते, आखिर तोते ने पूजा की पवित्रता जो नष्ट की है। अगला गीत भी इसी कथा का विस्तार है।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here