बिहार की मिठाइयाँ, देश दुनिया को अपने स्वाद का दीवाना बनाया है |

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बिहारी प्रतिभा से तो सारी दुनिया परिचित है, पर बिहार की एक और चीज है जो हर किसी को अपना दीवाना बना देती है | जी हाँ हम बात कर रहे हैं बिहार की लोकप्रिय मिठाइयों की जिसकी मिठास की दीवानी सारी दुनिया है, चाहे वो रून्नी सैदपुर का बालू शाही हो या भोजपुर उदवंतनगर का खुरमा या फिर गया का तिलकुट सभी ने अपने स्वाद के बदौलत बिहार की सीमा लांघ कर देश दुनिया को अपने स्वाद का दीवाना बनाया है |

सीतामढ़ी के रून्नी सैदपुर का बालू शाही

मुजफ्फरपुर से लगभग 35 किलोमीटर की दुरी पर स्थित रुन्नी-सैदपुर में बननेवाले बालूशाही की मांग देश भर में होती है | मैदा घी बेकिंग सोडा चीनी और दही से निर्मित यह मिठाई आप को 250 रूपए प्रति किलो दी दर से मिल जाएगी | इस मिठाई की सबसे खास ये है की इसका लुत्फ़ आप बनने के 20 से 25 दिनों के बाद भी कर सकते हैं

रोहतास के चेनारी के गुड़ के लड्डू

रोहतास के चेनारी बाजार में मिलने वाले इस खास लड्डू आप को एक अलग किस्म के स्वाद का परिचय कराएगा यह लड्डू खाने में सुपाच्य और पौष्टिक तो होता ही है, अपनी गर्म तासीर के कारण ठंड के दिनों में विशेष लाभदायक होता है
15 दिनों तक खराब नहीं होता है यह लड्डू और 120 रुपये से 150 रुपये किलो की दर से आप यहाँ इसे खरीद सकते हैं
सिलाव का खाजा

खाजा एक ऐसी मिठाई जिसके बगैर बिहार में कोई मांगलिक कार्य संपन्न ही नहीं होता है। शादी के बाद जब नई नवेली दुल्हन अपने पिया के घर जब आती है तो अपने साथ में सौगात के रूप में खाजा मिठाई जरूर लाती है और इसी खाजा को पूरे मोहल्ले टोले में बांटा जाता है। खाजा अपनी कई खूबियों की वजह से घर-घर में लोकप्रिय है। राजगीर और नालंदा के बीच स्थित सिलाव नामका स्थान है। सिलाव का जिक्र होते ही यहां के खाजा का स्वाद याद आ जाता है। दरअसल यहां का खाजा बेहद खास होता है। कुल 52 परत वाली ये खाजा बहुत ही खास्ता होता है।

सिलाव के खाजा की पहचान दूर देशों तक भी फैली हुई है। देसी और विदेशी सैलानी जब कभी राजगिर और नालंदा घूमने के लिए आते हैं तो वे अपने साथ सिलाव का खाजा भरपूर मात्रा में पैक करा कर ले जाना बिल्कुल नहीं भूलते हैं। जानकारों की माने तो बुद्ध काल से ही सिलाव में खाजा निर्माण की कला विकसित हुई थी।

उदवंतनगर का खुरमा

भोजपुर जिला मुख्यालय आरा से लगभग 12 किलोमीटर दूर बसे गाँव उदवंतनगर का खुरमा जो एक बार खा लेता वो इसके स्वाद को कभी नहीं भूलता, यही कारण है कि जो भी लोग उदवंतनगर से होकर गुजरते हैं वो इस मिठाई को खाना नहीं भूलते | खुरमा मिठाई के मिठास की लोकप्रियता का अंदाज़ा इसी से लगाया जा सकता है कि बिहार की इस पारंपरिक मिठाई खुरमा विदेशियों को भी खूब भाती है |

केवल छेना और चीनी से बनने वाली ये मिठाई शाहाबाद क्षेत्र के भोजपुर, रोहतास और बक्सर जिले अलावे बिहार में भी कहीं और नहीं मिलती | देखने में खुरमा बिल्कुल अनगढ़ की तरह दिखता है लेकिन अंदर से मिठास के साथ-साथ इतना रसीला होता है कि स्वाद जीभ से सीधा दिल में पहुंच जाता है | इस क्षेत्र के लोग अगर रिश्तेदार के घर जाते हैं तो इस मिठाई की डिमांड और बढ़ जाती है |

बक्सर की सोन पापड़ी

बक्सर शहर की सोन पापड़ी से कौन नहीं परिचित है? आप मुगलसराय रेल खंड के जरिये बिहार का सफर करते हों या फिर बिहार से बाहर जा रहे हों यहां की सोन पापड़ी आपको इतनी लुभाती है कि इसके स्वाद का मोह आप संवरण नहीं कर पाते हैं | यहां की सोन पापड़ी में एक ऐसी मिठास है जो अनूठी है |

स्टेशन रोड और यमुना चौक इलाके में पापड़ी के दर्जनों दुकान हैं जहां पर हर ग्राहक को शौक़ से मिठाई खरीदने के पूर्व मिठाई बकायदा प्लेट में खिलाई जाती हैं, यह परंपरा आज भी कायम हैं यह मिठाई के साथ प्यार का घुला हुआ मिठास होता है जो यहां के दुकानदार साथ में दे देते है |
बक्सर में आपको 100 रुपये किलो से लेकर 250 रुपये किलो तक सोन पापड़ी मिलेगी, यहां के कारीगरों ने बक्सर की सोन पापड़ी को जन सुलभ बनाकर इसकी प्रसिद्धि को और ऊंचाई दी है |

गया की तिलकुट

सर्वमान्य धारणा है कि धर्म नगरी गया में करीब डेढ़ सौ वर्ष पूर्व तिलकुट बनाने का कार्य प्रारंभ हुआ | वैसे अब टेकारी रोड, कोयरीबारी, स्टेशन रोड सहित कई इलाकों में कारीगर हाथ से कूटकर तिलकुट का निर्माण करते हैं | रमना रोड और टेकारी के कारीगरों द्वारा बने तिलकुट आज भी बेहद लजीज होते हैं | कुछ ऐसे परिवार भी गया में हैं, जिनका यह खानदानी पेशा बन गया है |

खास्ता तिलकुट के लिए प्रसिद्ध गया का तिलकुट झारखंड, पश्चिम बंगाल, दिल्ली, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र सहित अन्य राज्यों में भेजा जाता है | गया में हाथ से कूटकर बनाए जाने वाले तिलकुट बेहद खस्ता होते हैं | गया के तिलकुट के स्वाद का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि दिसंबर व जनवरी महीने में बोधगया आने वाला कोई भी पर्यटक गया का तिलकुट ले जाना नहीं भूलता | एक अनुमान के मुताबिक, इस व्यवसाय से गया जिले में करीब सात हजार से ज्यादा लोग जुड़े हैं |

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